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पशु पालन एक नजर में

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मनुष्य और पशुओं का इतिहास सहसत्राब्धियों साल पुराना है। पशुओं को पालने-पोसने का इतिहास सभ्यता के अवस्थांतर को दर्षाता है जहां समुदाय शिकारी जीवन शैली से कृषि की ओर अग्रसर हुए। मनुष्य ने आवश्यकताओं के अनुसार पशुओं को पालना शुरू किया जैसे कि दूध की पूर्ति के लिए गाय, भैंस, भेड़ व बकरी, कृषि के लिए बैल, यातायात के लिए अश्व, माँस तथा ऊन के लिए भेड़-बकरीयों एवं मुर्गियों को पालतू बनाकर, मनुष्य ने उनके विकास पर अधिकाधिक ध्यान दिया। ‘जब पशुओं का प्रजनन तथा जीवन अवस्थाएं मनुष्यों द्वारा संचालित की जाती हैं तो उनको पालतू पशु कहा जाता है‘।

दूध एक अमृत-तुल्य पेय पदार्थ है, जिसके बिना मनुष्य का जीवन नही चल सकता। शहरों में रहने वाले लोगों को दूध व माँस की प्राप्ति के लिए ग्रामीण आँचल के पशुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों लोग दूध के लिए गाय-भैंस पालकर एवं उनका दूध बेचकर ही अपनी आजीविका चलाते हैं। अत: खेती के लिए बैलों तथा पीने के लिए दूध की आपूर्ति हेतू मनुष्य ने गाय-भैंस वंशज पशुओं को पालतू बनाने के बाद, उनके विकास पर ध्यान दिया।

पशुधन प्रत्यक्षतौर पर या फसलों के माध्यम से हमारी हमारी वित्तिय सहायता करते हैं। पशुधन को हम चलता-फिरता बैंक भी कह सकते हैं, क्योंकि किसी भी परिवार में बेचे जाने वाली सबसे बढ़ी सम्पति है व जिसको हम बेचकर या गिरवी रखकर धन उधार ले सकते हैं। इस प्रकार राष्ट्र की अर्थ व्यवस्था में पशु पालन का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। विश्व में भारत को न केवल बहुमूल्य पशु सम्पदा का स्वामित्व प्राप्त है अपितु दुग्ध उत्पादन में भी भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। हमारे सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में भी पशुधन का सदैव प्रमुख रहा है।

देश के लाखों लोग जिनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है वे मुख्यत: पशुपालन पर ही निर्भर हैं। देश के लगभग 70 प्रतिशत पशु, लघु व सीमांत खेतीहर मजदूरों के पास हैं तथा कुल दुग्ध उत्पादन का 76 प्रतिशत भाग इन्ही के द्वारा पैदा किया जाता है।

दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान होने के बावजूद प्रति व्यक्ति प्रति दिन 258 ग्राम दूध ही उपलब्ध हो पाता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 314 ग्राम दूध आवश्यक है। जिसको उचित प्रजनन विधि अपनाकर पूरा किया जा सकता है।

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